बुधवार, 12 फ़रवरी 2014
शुक्रवार, 3 जनवरी 2014
मेरी पतंग
फरफर करती उड़ती
जाती
मन को ये भाने वाली
है
रंग बिरंगे रूप
सजाये
पतंग मेरी मतवाली है
कोई माथे चाँद सजाये
कभी तिरंगा हम
फहराएं
संग दूसरों के
मिलजुलकर
खेले वो खेल निराली
है
लम्बी सी इक पूंछ
लगाये
सर पर ताज पहन
इठलाये
बादल से है दौड़
लगाती
पंछी से करे ठिठोली
है
छूट डोर हाथों से
जाये
या कि पतंग कभी कट
जाये
सुख दुख का ही नाम
जिंदगी
समझाये मेरी सहेली
है
सभी चित्र गूगल से साभार
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