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गुरुवार, 31 मई 2018

एक शहीद की बेटी



जग जीवन का रेलम-पेला
चढ़ काँधे मैं देखूँ मेला
मन को जब अरमान सताये
पापा तुम बिन कुछ ना भाये
तुम होते फुटबॉल खेलती
हंसकर सब परिणाम झेलती
झूलों पर जब पींग बढाती
ऊँचाई ना कभी डराती
डोली जब ससुराल चलेगी
कमी पिता की बहुत खलेगी
देखूं जब भी परचम प्यारा
मुझे मिले आशीष तुम्हारा
पदचिन्हों पर सदा चलूंगी
तुम जैसी मजबूत बनूँगी
चन्दन चर्चित नाम करूंगी
ऐसा मैं इतिहास रचूँगी 


गूगल पर उपलब्ध चित्र से प्रेरित बालकविता 

रविवार, 19 जून 2016

बन्दर का संदेसा


                          क्या मानव को सूझा फिर से , कौतुक कोई न्यारा
या संदेसा लिखकर भेजा, उसने कोई प्यारा

कैसा यह नोटिस है मम्मा, मुझको भी बतलाओ
पढ़ना लिखना मुझको भाए, थोड़ा तो सिखलाओ

चाहूँ तो बेटा मैं भी यह, तुमको खूब पढाऊँ
लेकिन भूल मनुज की देखूँ, सोच सोच घबराऊँ

काट काट कर जंगल नित-नित, कागज ढ़ेर बनाये
ज्ञान बाँटने को फिर नारे, नए नए लिखवाये

पेड़ बचाओ कहता फिरता, इक दूजे से अक्सर
और फाड़ता बिन कारण ही, बिन उत्सव बिन अवसर

पढ़ने लिखने का मतलब है, जो सीखो अपनाओ
कथनी-करनी के अंतर से, अब तो ना भरमाओ

भेज रही हूँ उन्हें निमंत्रण, आकर देखें जंगल
पेड़ों की खुसफुस पंछी के,  कलरव सुनना मंगल

बातों से ना जी बहलाओ, असली जोर लगाओ
छोटे से छोटे कागज़ को, भैया जरा बचाओ





शुक्रवार, 6 मार्च 2015

होली


नन्नू आओ माही आओ,

खेलेंगे हम होली

मीठी गुझिया में मम्मी ने,


मेवा-मिश्री घोली

गली गली हुडदंग मचाते,

घूमें नन्हे तारे

अगर ढोल पर ताल बजी तो,

थिरकेंगे मिल सारे

भर पिचकारी तुम ले आओ,

मैं रंगों की थाली

सुर में चाहे चाहे बेसुर,

गायें मिल क़व्वाली

गुब्बारों से दूर रहें हम,

हो बरबाद न पानी

तभी सयाने कहलायें जो,

बात बड़ों की मानी

ता रा रा रा करती घूमे,

इक मस्तानी टोली

मम्मी बोली बस भी कर दो,

होली तो अब हो ली


सार छंद    



चित्र गूगल से साभार 

शुक्रवार, 30 मई 2014

दीदी जैसा मेडल लाऊं

भींत पार की सुन्दर दुनिया
क्या सचमुच है भूल-भुलैया
कोई तो मुझको ले जाए
बॉटल टिफिन नये दिलवाए

विद्यालय का बस्ता भारी
करनी पड़े खूब तैयारी
अक्सर मुझे डराते भैया
लेकिन मैं जाऊँगा मैया

ईंट सहारे ऊपर चढ़कर
कल ना देखूँगा मैं छुपकर
नित-नित मैं व्यायाम करूँगा
जीवन में शुभ काम करूँगा

दीदी जैसा मेडल लाऊं
साहब पापा सा बन जाऊं
पंखों को फैलाकर अपने
देख रहा मैं सुन्दर सपने 




चित्र गूगल से साभार एवं ओबीओ परिवार को धन्यवाद सहित 

शनिवार, 15 मार्च 2014

खेलें होली



मस्त मस्त नाचे अलबेली
रंगरेजों की आई टोली

मन का कचरा आज जलाकर
द्वेष दर्द को चले मिटाकर        
जूही चंपा और चमेली
फूलों से भर लेंगे झोली

आया फागुन प्रेम जगाएं
नफरत को हम दूर भगाएं
थाली में रख मीठी बोली
आ री ! आली खेलें होली 



चित्र गूगल से साभार 

बुधवार, 12 फ़रवरी 2014

घड़ी उपहार


राखी का था जब त्यौहार
घड़ी मिली मुझको उपहार

रंग अनोखा उसका लाल
मुझे उठाती प्रात:काल

कुकड़ू कूँ की देती टेर
कहती उठ जा होगी देर

घड़ी समय का देती ज्ञान
पलपल का रखना तुम ध्यान

समय बताती रहकर मौन
बूझो तो यह लाया कौन

भैया ने दी गुल्लक खोल

कहते बहना है अनमोल 





चित्र गूगल से साभार 

शुक्रवार, 3 जनवरी 2014

मेरी पतंग

फरफर करती उड़ती जाती 
मन को ये भाने वाली है
रंग बिरंगे रूप सजाये
पतंग मेरी मतवाली है

कोई माथे चाँद सजाये
कभी तिरंगा हम फहराएं
संग दूसरों के मिलजुलकर
खेले वो खेल निराली है

लम्बी सी इक पूंछ लगाये
सर पर ताज पहन इठलाये
बादल से है दौड़ लगाती
पंछी से करे ठिठोली है


छूट डोर हाथों से जाये
या कि पतंग कभी कट जाये
सुख दुख का ही नाम जिंदगी

समझाये मेरी सहेली है 








सभी चित्र गूगल से साभार 

गुरुवार, 12 दिसंबर 2013

गुड़िया का ब्याह

सजी सजीली नन्हीं गुड़िया
शरमाई आफत की पुड़िया

मिल कर उसका ब्याह रचाया
मंडप प्यारा खूब सजाया

बजती है ढोलक शहनाई
मस्ती में बाराती भाई

पकवानों का दौर चलेगा
गायें नाचें रंग जमेगा

खेल सभी मिलकर खेलेंगे

कभी न प्यारे हम झगड़ेंगे 



छवि : गूगल से साभार 

रविवार, 24 नवंबर 2013

छाता मेरा




रंग बिरंगे फूल विराजे
एक टांग पर तिकधिन नाचे
जैसे गुडिया फ्रॉक निराला
मेरा छाता है मतवाला

बरखा से वो मुझे बचाये
भरी धूप माथा सहलाये
दादा जी का साथी सच्चा
लगता नाना को भी अच्छा

मोर नाचते जब उपवन में
इन्द्रधनुष सजते हैं नभ में
छाता मेरा मुझे बुलाये
गोल गोल घूमे इतराये


चित्र : गूगल से साभार 

शनिवार, 21 सितंबर 2013

चलो न दादू



नभ आँगन को छूकर चहकूँ, थामे हाथ तिहारा
नाजुक न्यारा हम दोनों का, रिश्ता दादू प्यारा
महावीर गौतम कोलंबस, सुनूँ सभी गाथाएं
ब्लॉग आपके लिखकर सीखूं, रसभीनी कवितायें
सभी जटिलताएं जीवन की, अनुभव से सुलझाना
कंप्यूटर पर हम ढूंढेंगे, कोई खास पुराना
विश्वास जगाता है हरदम, ये बाँहों का घेरा
मंदिर मस्जिद गिरिजाघर सम, गुरुद्वार तुम मेरा
चलो न दादू झूलों पर हम, ऐसे पेंग बढ़ाएं
सूरज चंदा बाँध पोटली, साध उजाले गायें 





चित्र गूगल से साभार 

शनिवार, 10 अगस्त 2013

इक पेड़ लगा दो

माँ तुम अब के सावन की रुत

आँगन में इक पेड़ लगा दो

नहीं चाहता खेल खिलौने

बस छोटा सा पेड़ लगा दो


शोर मचाते मोटर बन्दर

अब नहीं जीतते मेरा मन

मशीनगन का नहीं फायदा

टैंकों ने कब जीते दुश्मन

बैठे जिस पर चिड़िया चुनमुन

ऐसा सुन्दर पेड़  लगा दो



हरा रंग सबको हर्षाये

खिले फूल राही ललचाये

खुशबू अपने आँगन फैले

ठंडी छाया सब सुख पायें

कभी न झगड़ा करने वाला


इक प्यारा सा दोस्त बना दो 

शुक्रवार, 21 जून 2013

फर्ज निभाएं


                                      

इक कालीन कहीं मिल जाए

सैर गगन की हम कर आयें

उड़नखटोला लेकर मित्रों

फूलों की घाटी तक जाएँ


रंग बिरंगे फूल खिले हों

गुंजन भँवरे भी करते हों

बुलबुल मीठा गान सुनाती

अठखेली पंछी करते हों


तितली रस फूलों से लाये

सौरभ सबका मन हर्षाये

नन्हा सा इक बीज उगाकर

हम भी अपना फर्ज निभाएं  



चित्र गूगल से साभार 

सोमवार, 3 दिसंबर 2012

गोलगप्पे वाला



छोटा सा गोल-गप्पे वाला  
काम है देखो बड़ा निराला


नन्हीं नन्हीं पूरी बनाकर
कद्दू सा फिर उन्हें फुलाकर
भरे वो खट्टा मीठा पानी
मिर्च लगे तो दे गुडधानी

सुना है रोज वो जाता स्कूल
कभी होम वर्क गया जो भूल
लेकिन देखी उसकी मेहनत
साथी सब करते हैं इज्जत

माना मंजिल थोड़ी दूर
काम लगन से करे भरपूर
दोहरा रहा है वह यह रीत
परिश्रम की होती है जीत