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रविवार, 21 अक्टूबर 2012

पेड़ और प्रकाश संश्लेषण



ना सांस लेते दिखाई दें
ना बात करते सुनाई दें
ना चलते न दौड़ ही पाते
मगर सजीव ये कहलाते

ज्ञान गंगा डुबकी लगाओ
भैया मेरे मुझे बताओ
मम्मी मुझको देती खाना
चिड़िया भी है खाती दाना

पेड़ कहाँ से भोजन पायें
बिना हाथों कैसे पकाएं
खाना इन्हें भेजता कौन
बोलो न भैया क्यों हो मौन

पत्तियाँ इनका कारखाना
क्लोरोफिल का भरा खजाना
धूप हवा पानी मिल जाए
फिर ये भोजन स्वयं बनाएँ

कार्बन डाई ऑक्साइड रेट
दे ऑक्सीजन अनोखी भेंट
स्टार्च-शर्करा झट बन जाए
प्रकाश संश्लेषण कहलाये


(चित्र गूगल से साभार )

रविवार, 31 जुलाई 2011

चक्कर गोल

धरती अपनी गोल मटोल
कुदरत के सब चक्कर गोल
देखो भेद रही है खोल
समय रहते ही समझो मोल

उर्जा देते हैं सूरज दादा
बाँटेंगे पेड़ क्र लिया वादा
आये ना इसमें कोई बाधा
हिस्सा सबका कम न ज्यादा

दूषित वायु ये अपनाएँ
शुद्ध हवा हमको दे जाएँ
पत्तियां इनकी भोजन बनाएँ
पौधों से सब जीवन पायें

एक दूसरे के उपकारी
शाकाहारी -माँसाहारी
वन वैभव बिन नहीं निभेगी
वन जीवों से रिश्तेदारी

बुधवार, 29 जून 2011

छुपम-छुपाई खेलें तारे


सुबह सुबह जब सूरज जागे
तारे ना खिड़की से झाँके
कहाँ छुपे सब डर के मारे
क्या बच्चे बन जाते सारे
धरा धुरी पर घूमे ऐसे
एक कील पर टिकी हो जैसे
सूर्य के जो आगे आये
उस हिस्से पर दिन हो जाए
रहते तो हैं नभ में तारे
तेज प्रकाश में छुपते सारे
अन्धकार में वो दिखते हैं
और उजाले में छिपते हैं
रंग सभी के न्यारे न्यारे
छुपम-छुपाई खेलें तारे

रविवार, 27 मार्च 2011

हिचकी

हिचहिच हिचक जब आई हिचकी

परेशान हुई नन्हीं पिंकी

कहने लगी वह दादी माँ से

खाऊं क्या दही दूध बताशे

पानी काफी सारा पी लिया

नाम न इसने रुकने का लिया

नानी को तेरी याद आई

उत्तर दिया दादी मुस्काई

दादाजी सुनते थे सब बात

आओ बतलायें असली राज

डायफ्राम फेफड़ों के नीचे

सांस ले अंदर बाहर भेजे

फैलता सिकुड़ता फिर फैलता

यह सब निश्चित ताल में चलता

कभी अचानक सिकुड यह जाए

श्वास खिंचे आवाज़ जो आये

इसे ही तब हिचकी कहते हैं

फिर सांस गहरी लेते हैं

या पल भर रोक जो लेते हैं

मुक्त हिचकी से हो जातें हैं