रविवार, 19 जून 2016

बन्दर का संदेसा


                          क्या मानव को सूझा फिर से , कौतुक कोई न्यारा
या संदेसा लिखकर भेजा, उसने कोई प्यारा

कैसा यह नोटिस है मम्मा, मुझको भी बतलाओ
पढ़ना लिखना मुझको भाए, थोड़ा तो सिखलाओ

चाहूँ तो बेटा मैं भी यह, तुमको खूब पढाऊँ
लेकिन भूल मनुज की देखूँ, सोच सोच घबराऊँ

काट काट कर जंगल नित-नित, कागज ढ़ेर बनाये
ज्ञान बाँटने को फिर नारे, नए नए लिखवाये

पेड़ बचाओ कहता फिरता, इक दूजे से अक्सर
और फाड़ता बिन कारण ही, बिन उत्सव बिन अवसर

पढ़ने लिखने का मतलब है, जो सीखो अपनाओ
कथनी-करनी के अंतर से, अब तो ना भरमाओ

भेज रही हूँ उन्हें निमंत्रण, आकर देखें जंगल
पेड़ों की खुसफुस पंछी के,  कलरव सुनना मंगल

बातों से ना जी बहलाओ, असली जोर लगाओ
छोटे से छोटे कागज़ को, भैया जरा बचाओ





शुक्रवार, 6 मार्च 2015

होली


नन्नू आओ माही आओ,

खेलेंगे हम होली

मीठी गुझिया में मम्मी ने,


मेवा-मिश्री घोली

गली गली हुडदंग मचाते,

घूमें नन्हे तारे

अगर ढोल पर ताल बजी तो,

थिरकेंगे मिल सारे

भर पिचकारी तुम ले आओ,

मैं रंगों की थाली

सुर में चाहे चाहे बेसुर,

गायें मिल क़व्वाली

गुब्बारों से दूर रहें हम,

हो बरबाद न पानी

तभी सयाने कहलायें जो,

बात बड़ों की मानी

ता रा रा रा करती घूमे,

इक मस्तानी टोली

मम्मी बोली बस भी कर दो,

होली तो अब हो ली


सार छंद    



चित्र गूगल से साभार