बुधवार, 21 दिसंबर 2011

सांताक्लॉज



नॉर्थपोल का रहने वाला
मैं दुनिया में सबसे आला

नहीं अन्जानी है यह बात
आता सिर्फ क्रिसमस की रात
सांता क्लॉज है मेरा नाम
प्यार बांटना मेरा काम

रुनझुन रुनझुन घंटी बाँधी
चन्द्र किरण की करूँ सवारी
स्लेज कहाये मेरी गाड़ी
लाल सूट है लंबी दाढ़ी


गाँव हमारा बड़ा निराला
माह जून में ऐसा होता
सूर्य चमकता दिन और रात
कहो अनोखी है ना बात



लिये  साथ  चाँद और तारे
आऊंगा मैं हर घर द्वारे
बिस्कुट टॉफी केक खिलौने
रखता बच्चों के सिरहाने

काम करे जो अच्छे सच्चे
मेरी पसंद हैं वे ही बच्चे



merry christmas

thnks to  



बुधवार, 30 नवंबर 2011

चुहिया और बिल्ली

ताम ताम ते तत ते तानी
मैं तो हूँ शैतान की नानी
पूंछ उठाकर छम छम नाचे
छोटी नटखट चुहिया रानी

नीचे ऊपर ऊपर नीचे
चादर ताने परदे खींचे
लगा के ऐनक ऐसे बैठे
जैसे कोई चिट्ठी बांचे

दूर से बिल्ली देख  रही थी
पलकें झप झप झपक रही थी
कैसे पकडूँ कैसे झपटूँ
बैठी बैठी सोच रही थी

दोहराऊँगी वही कहानी
भूल जायेगी सब शैतानी
मैं तो ठहरी शेर की मौसी
याद आएगी तुझ को नानी

समझ न मुझको सीढ़ी सादी
देखी न होगी मुझ सी आंधी
बुजुर्गों ने भी मानी  हार
किसने मेरे घंटी बाँधी

ताम ताम ते तत ते तानी
बेशक तू शैतान की नानी
लेकिन मैं तुझसे भी सयानी
मेरा नहीं है कोई सानी


रविवार, 13 नवंबर 2011

जंगल में क्रिकेट

घोड़ों का मत था भाई
सारे मिलकर बोलो
गेंद और स्टिक ले आएँ
हम खेलेंगें पोलो

उधर हाथियों ने मिलकर
बना लिया एक प्लान
बॉल बड़ी सी लेकर के
हम खेलेंगे चौगान

बाकी सभी सोच रहे थे
नवीन पुरातन खेल
अच्छी यदि रहे भावना
खेल से बढ़ता मेल

अलग अलग ना अब सारे
मिल खेलेंगे क्रिकेट
कोई लाये बॉल और
कोई मंगाए बैट

झटपट मैदान बन गया
हुई तैयारी पूरी
लो तभी बरसात आई
रही खुशियाँ अधूरी

अगले दिन अब खेलेंगे
हम फिर से यही खेल
एक दूजे के पीछे सब
चल दिए बन कर रेल

बरसात रुकी तो सारे
दौड़े दौड़े आये
खेल का साजो सामान
उठाकर बन्धु लाए

लोमड़ी ने बैट पकड़ा
गधों ने की फील्डिंग
बंदर बॉलिंग करे था
हाथी अम्पायरिंग

कौवों ने शोर मचाया
जमकर किया था हूट
शेर बने थे मुख्य अतिथि
पहने हुए थे सूट

मिलजुल सबने की मस्ती
खूब मची रही धूम
आसमान सर पर ढोया
जंगल रहा था घूम




happy children's day

शनिवार, 29 अक्तूबर 2011

कठपुतली


चंचल चपल अरी कठपुतली

ठुमक ठुमक नाचे बन बिजली

डोर हिलाकर कौन चलाये

हाथ इशारे मौन नचाये

चाल सहेली किसने बदली

इत उत नाचे जैसे तितली

मधुर मधुर तू गान सुनाए

संदेसा अनुपम दे जाए

देख कमरिया तेरी पतली

याद हमें आ जाए मछली

http://www.youtube.com/watch?feature=player_embedded&v=Vrsj4ZAU2PY#!

रविवार, 2 अक्तूबर 2011

तितली


दूर देश से आई तितली
खबर बहुत सी लायी तितली

कानों को वो छूकर बोली
फूलों से मैं करूँ ठिठोली
सोचा मैनें दोस्त बना लूं
बैठ गयी चुपचाप हथेली

अपनी उसने कथा सुनाई
बागों में थी धूम मचाई
पुष्पों से लेकर मकरंद
खुशी से फूली न समाई

खिलें परस से उसके कलियाँ
बाग बगीचे जंगल गलियां
इन्द्रधनुष धरती पर छाये
आएँ जब जब तितली सखियाँ



शनिवार, 10 सितंबर 2011

बया का बच्चा



यह नन्हा सा बया का बच्चा

शायद थोडा अकल का कच्चा

मम्मी ने तो मना किया था

पर इसने कब ध्यान दिया था

नीड़ से मैं बाहर खेलूंगा

ऊँची ऊँची उड़ान भरूँगा

बिन पूछे वो घर से निकला

खेला उस दिन बहुत ही खेला

बैठी वहाँ थी मौसी बिल्ली

मानों उड़ा रही थी खिल्ली

जब नन्हें ने देखा नजारा

घबराकर फिर माँ को पुकारा

जान कहीं यह निकल ही जाती

पास अगर माँ ना आ जाती

पकडे उसने फिर तो कान

माँ की बातों पर दूंगा ध्यान


रविवार, 4 सितंबर 2011

नया जमाना

दादी जी हाँ दादी जी
बात सुनो तुम मेरी भी

कभी चाँद पर रहती थी
चरखा काता करती थी
कहाँ गयी बूढी दादी
तुम मुझको बतलाओ जी

बिटिया अब नया जमाना
नया भेद सबने जाना
छोड़ो अब वो ज्ञान पुराना
नया ज्ञान अपनाओ जी

नहीं हवा नाही पानी
कोशिश अब ये इंसानी
कभी बसेगी कॉलोनी
घर अपना बनवाओ जी

कोशिश तुम ये ही करना
तभी चाँद पर पग धरना
सीखो प्यार से जब रहना
सुन्दर जहां बनाओ जी

रविवार, 21 अगस्त 2011

बरखा रानी


क्यारी क्यारी भरता पानी

फूल फूल की चुनरी धानी

चुन सावन डोकरियां सारी

खुशियाँ लायी बरखा रानी

बन बालहंस उड़ते फिरते

मछलियों संग तैरा करते

पांव जरा न सीधे पड़ते

शोर मचाते छप छप चलते

पत्ती-पत्ती ने मुँह धोया

खेतों में बीजों को बोया

देख जलद सूरज अलसाया

हर किसान अब था हरषाया


(सावन डोकरियां -वीरबहुटी )

सोमवार, 15 अगस्त 2011

भारत की नई तस्वीर


अपने हाथों से लिखेंगे हम अपनी तकदीर

बनायेंगे नये भारत की एक नई तस्वीर


गूंजे वेद ऋचाएं और पुराणों की वाणी

दिखलाती सन्मार्ग दादी नानी की कहानी

जन्मेंगे फिर यहाँ दधीचि कर्ण दानवीर

बनायेंगे नये भारत की एक नई तस्वीर


माता-पिता भक्त यहाँ राम श्रवण सम होंगे

संकल्पपूर्ण धीर भागीरथ भगत भी होंगे

मीरा सी भक्ति होगी होवेंगे भक्त कबीर

बनायेंगे नये भारत की एक नई तस्वीर


गांधी सा धैर्य और विवेकानंद का विवेक

फैलेगा हर घर में महावीर बुद्ध आलोक

सदा रहें तैयार देश हित बन जाएँ फ़कीर

बनायेंगे नये भारत की एक नई तस्वीर


लक्ष्मीबाई वीरांगना सी होंगी बालिकाएं

ममतामयी पन्नाधाय सी घर घर साधिकाएं

कल्पना चावला सा होगा एक लक्ष्य गंभीर

बनायेंगे नये भारत की एक नई तस्वीर


न भुलाएं अपनी थाती को लिखें संस्कृति गीत

केवल इतिहास नहीं हम विज्ञान के भी मीत

प्रेम अहिंसा आधारित होंगी नई तकनीक

बनायेंगे नये भारत की एक नई तस्वीर

रविवार, 31 जुलाई 2011

चक्कर गोल

धरती अपनी गोल मटोल
कुदरत के सब चक्कर गोल
देखो भेद रही है खोल
समय रहते ही समझो मोल

उर्जा देते हैं सूरज दादा
बाँटेंगे पेड़ क्र लिया वादा
आये ना इसमें कोई बाधा
हिस्सा सबका कम न ज्यादा

दूषित वायु ये अपनाएँ
शुद्ध हवा हमको दे जाएँ
पत्तियां इनकी भोजन बनाएँ
पौधों से सब जीवन पायें

एक दूसरे के उपकारी
शाकाहारी -माँसाहारी
वन वैभव बिन नहीं निभेगी
वन जीवों से रिश्तेदारी

रविवार, 17 जुलाई 2011

बादल छाये


उमड़-उमडकर ढोल बजाएँ

काले काले बादल छाये

सागर का संदेसा लाये

कैसे कैसे रूप सजाये


उजली सी रुई के गोले

पर थोड़े से हो गए मैले

दौड पकड़ खेलें मतवाले

भेष धरे हैं नए निराले


देख हुआ है चुनमुन राजी

नावों में लग जाए बाजी

बिल्लू बंटी अब्दुल काजी

बोलो कौन बनेगा माँझी


बिजली ने बन सखी सहेली

ओढ़ी चूनर नई नवेली

अब महक मेहंदी की फैली

धरती की सज गयी हथेली


देख जलद मेंढक टर्राये

मोर नाच के किसे रिझाये

हलधर के मन को हरखाये

देखो देखो जलधर आये


उमड़-उमडकर ढोल बजाएँ

काले काले बादल छाये

रविवार, 10 जुलाई 2011

गिलहरी

देखो मेरी दोस्त गिलहरी

रची पीठ पर काली धारी

दो हाथों में पकड़ फलों को

लगती है वो कितनी प्यारी

नीचे ऊपर ऊपर नीचे

कूदे-फाँदे इत उत भागे

लंबी लंबी बड़ी भली सी

ब्रुश सी पूँछ गज़ब ही लागे

मैं चाहूँ संग मेरे खेले

खेल खिलौने सारे ले ले

फुर्ती अपनी दे दे थोड़ी

तो फिर मैं बन जाऊं ‘पेले’

मूँगफली उसको ललचाए

कुतर कुतर सारी खा जाये

पापा मम्मी से बोलूँगा

उसकी खातिर ले कर आयें


thanks to

Image: FreeDigitalPhotos.net

बुधवार, 29 जून 2011

छुपम-छुपाई खेलें तारे


सुबह सुबह जब सूरज जागे
तारे ना खिड़की से झाँके
कहाँ छुपे सब डर के मारे
क्या बच्चे बन जाते सारे
धरा धुरी पर घूमे ऐसे
एक कील पर टिकी हो जैसे
सूर्य के जो आगे आये
उस हिस्से पर दिन हो जाए
रहते तो हैं नभ में तारे
तेज प्रकाश में छुपते सारे
अन्धकार में वो दिखते हैं
और उजाले में छिपते हैं
रंग सभी के न्यारे न्यारे
छुपम-छुपाई खेलें तारे

शनिवार, 18 जून 2011

धुनिया और गीदड


ले हाथों में धुनकी घोंटा

और संग था डोरी लोटा

वह था धुनिया अपनी धुन में

धुनक धुनक करता था वन में

डर को अपने दूर भगाता

मन ही मन खुद को समझाता

खेल नहीं कोई दंगल है

मेरे भाई यह जंगल है

दूर बहुत नहीं अगला गांव

चल बढ़ चलाचल मेरे पांव

सांझ हुई तू पार करा दे

अब के भगवन मुझे बचा ले

तभी सामने गीदड़ आया

रंग में था जो अभी नहाया

उसने जब धुनिया को देखा

था सामने जनम का लेखा

यह तो मुझको ना छोडेगा

गर भागूं पीछे दौडेगा

हालत धुनिया की भी ऐसी

बिल्ली देख कबूतर जैसी

एक एक पल ऐसे बीता

गीदड़ उसको दीखा चीता

गले दोनों के अटके प्राण

आया गीदड़ को फिर ध्यान

समय काम आई चतुराई

चापलूस ने जान बचाई

हर एक वचन को मन में तोला

मीठे सुर में गीदड़ बोला

लेकर हाथ धनुष और बाण

कहाँ की सैर करे सुलतान

देव भाग्य ने पलटा खाया

धुनिया मन ही मन मुस्काया

बोली मीठी पड़ी जब कान

आई रे अब जान में जान

सुन जंगल में मंगल सुराज

चले आये हम भी वनराज

इक दूजे को देकर आदर

भागे सरपट जान बचाकर



टिप्पणी

१ . लोककथा पर आधारित

२ .रुई धुनने का उपकरण धनुष जैसा होता था

रविवार, 22 मई 2011

रूठा मुरगा


ना जाने किस बात पे ऐंठा

मुरगा गाल फुलाए बैठा

क्या अपनी मम्मी से रूठा

किया नहीं कल से मुँह जूठा

मन ही मन वो सबको तोले

लेकिन मुँह से बोल न बोले

पूछे सभी राज वो खोले

प्यारे ये मुरगे जी बोलें

आखिर उसने ली अंगडाई

गोल गोल कुछ आँख घुमाई

पूँछ जरा अपनी फडकाई

दिल को लगी थी ठेस बतलाई

सुबह सभी को मैं ही जगाऊं

कुकडू कूँ की टेर लगाऊं

तुम ना मुझको मानो ताऊ

बोलो अगर भूल मैं जाऊं

कैसे फिर सब काम करेंगे

चिंता में दिन रात घुलेंगे

सोने से पहले जागेंगे

रातों को उठकर भागेंगे

इतने में सूरज दा ‘निकले

हँसकर वो मुरगे से बोले

तू जो प्यारे आँख न खोले

धरती ना ये फिर भी डोले

किरणों के पाखी आयेंगे

बाग बाग में फूल खिलेंगे

भँवरे भी गुनगुन गायेंगे

सारे काम समय से होंगे

दूर करें हम मन के जाले

वहम न कोई मन में पालें

शनिवार, 7 मई 2011

आज़ाद बुलबुल

आओ नन्हीं बुलबुल आओ
मीठा मीठा गीत सुनाओ
पिंजरा सोने का बना दूँ
हीरे उसमें लाख जड़ा दूँ


फल मीठे दूंगी खाने को
ठंडा ठंडा जल पीने को
न भाई न मैं नीलगगन की
सखी सहेली मुक्त पवन की


पिंजरे में रहना न भाये
बंदी कैसे स्वप्न सजाये
माना कि आज़ाद घूमोगी
नदिया पर्वत वन ढूँढोगी


रास्ता लेकिन भटक गयी तो
वर्षा गर्मी खटक गयी तो
मुश्किल से मैं न मानूँ हार
ये सभी तो ईश्वर उपहार




इस जग में वह ही जीतेगा
हिम्मत दिल में जो रख लेगा

मंगलवार, 26 अप्रैल 2011

हठ जो करो तो ...



भूले भटकों को राह दिखाता

दिशाहारों की आशा जगाता

हठीला है पूरब का सितारा

खूब चमकीला भोर का तारा

सब तारे चलकर इसे मनाएं

किरण बहनें भी लाख समझाएं

जब तक सूरज जी खुद न आये

नन्हा ये सितारा घर न जाये


चलती रही है समय की चक्की

थी राजकुंवर ध्रुव की धुन पक्की

पा न सको जग में वो चीज नहीं

माँ ने ऐसी ही शिक्षा दी थी

हठ जो करो तो ध्रुव सी ही करना

छोटी बातों पर ध्यान न धरना

या तो सितारा भोर का बनना

या ध्रुव बन उत्तर दिशा चमकना

शनिवार, 23 अप्रैल 2011

जल अनमोल


पूछे दीदी की सहेली
गुडिया बूझो एक पहेली
जादू देखो यह हर बार
मनचाहा होवे आकार
रंग गंध भी अपनी नहीं
मरुस्थल मिले जल्दी नहीं
आता है वो सबके काम
बूझो बूझो उसका नाम
समझ पाई है यह पानी
गुण ऐसे कि हो हैरानी
मिली जगह कि फैले खुल के
नदिया सागर रूप हैं जल के
कण कण इसके दोस्त पक्के
जलद बनते नील गगन के
रंग गंध तो मित्र हजार
शक्ति इसकी होती अपार
देखो व्यर्थ बहे न पानी
वरना होगी परेशानी
बड़ा अनमोल अमृत है जल
आज खोया तो मिले न कल