रविवार, 10 जुलाई 2011

गिलहरी

देखो मेरी दोस्त गिलहरी

रची पीठ पर काली धारी

दो हाथों में पकड़ फलों को

लगती है वो कितनी प्यारी

नीचे ऊपर ऊपर नीचे

कूदे-फाँदे इत उत भागे

लंबी लंबी बड़ी भली सी

ब्रुश सी पूँछ गज़ब ही लागे

मैं चाहूँ संग मेरे खेले

खेल खिलौने सारे ले ले

फुर्ती अपनी दे दे थोड़ी

तो फिर मैं बन जाऊं ‘पेले’

मूँगफली उसको ललचाए

कुतर कुतर सारी खा जाये

पापा मम्मी से बोलूँगा

उसकी खातिर ले कर आयें


thanks to

Image: FreeDigitalPhotos.net

4 टिप्‍पणियां:

  1. यह गिलहरी तो बहुत प्यारी है. अच्छा लगा आपको पढना..बधाई !!
    _______________
    शब्द-शिखर / विश्व जनसंख्या दिवस : बेटियों की टूटती 'आस्था'

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  2. वंदना जी ये तितली बड़ी प्यारी है-रंग बिरंगी न्यारी है -भ्रमर संग संग उड़ता जाता - मिले गिलहरी तो फल खाता
    सुन्दर मनमोहक बाल कविता बधाई हो
    आभार आप का
    शुक्ल भ्रमर ५
    बाल झरोखा सत्यम की दुनिया
    http://surenrashuklabhramar5satyam.blogspot.com

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  3. बहुत ही प्यारी रचना है ....आभार

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