रविवार, 31 जुलाई 2011

चक्कर गोल

धरती अपनी गोल मटोल
कुदरत के सब चक्कर गोल
देखो भेद रही है खोल
समय रहते ही समझो मोल

उर्जा देते हैं सूरज दादा
बाँटेंगे पेड़ क्र लिया वादा
आये ना इसमें कोई बाधा
हिस्सा सबका कम न ज्यादा

दूषित वायु ये अपनाएँ
शुद्ध हवा हमको दे जाएँ
पत्तियां इनकी भोजन बनाएँ
पौधों से सब जीवन पायें

एक दूसरे के उपकारी
शाकाहारी -माँसाहारी
वन वैभव बिन नहीं निभेगी
वन जीवों से रिश्तेदारी

13 टिप्‍पणियां:

  1. बच्चों के लिए लिखी गई कविता बहुत प्यारी है ......आभार

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  2. सुन्दर प्यारी प्यारी सी कविता.

    वन वैभव बिन नहीं निभेगी
    वन जीवों से रिश्तेदारी.

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  3. बहुत सुंदर ,अच्छी लगी, बधाई ....

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  4. बहुत ही प्यारी कविता. शब्द पुष्टिकरण/वोर्ड वेरिफिकेशन हटा दें असुविधा होती है सबको

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  5. बहुत ही मनभावन,बहुत ही सुन्दर.

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  6. बहुत खूब ..अच्छी प्रस्तुति

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  7. महा काल के हाथ पर गुल होतें हैं पेड़ ,सुषमा सारे लोक की कुल होतें हैं पेड़ ,और एक बात और अपनी ही खुद खाद भी बन जातें हैं पेड़ ,अच्छी सार्थक सौदेश्य पोस्ट .बधाई .
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    Links to this post at Friday, August 12, 2011
    बृहस्पतिवार, ११ अगस्त २०११

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  8. सुंदर भाव का सम्प्रेषण ....अच्छी शैली में ... .....!

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