रविवार, 24 नवंबर 2013

छाता मेरा




रंग बिरंगे फूल विराजे
एक टांग पर तिकधिन नाचे
जैसे गुडिया फ्रॉक निराला
मेरा छाता है मतवाला

बरखा से वो मुझे बचाये
भरी धूप माथा सहलाये
दादा जी का साथी सच्चा
लगता नाना को भी अच्छा

मोर नाचते जब उपवन में
इन्द्रधनुष सजते हैं नभ में
छाता मेरा मुझे बुलाये
गोल गोल घूमे इतराये


चित्र : गूगल से साभार 

शनिवार, 21 सितंबर 2013

चलो न दादू



नभ आँगन को छूकर चहकूँ, थामे हाथ तिहारा
नाजुक न्यारा हम दोनों का, रिश्ता दादू प्यारा
महावीर गौतम कोलंबस, सुनूँ सभी गाथाएं
ब्लॉग आपके लिखकर सीखूं, रसभीनी कवितायें
सभी जटिलताएं जीवन की, अनुभव से सुलझाना
कंप्यूटर पर हम ढूंढेंगे, कोई खास पुराना
विश्वास जगाता है हरदम, ये बाँहों का घेरा
मंदिर मस्जिद गिरिजाघर सम, गुरुद्वार तुम मेरा
चलो न दादू झूलों पर हम, ऐसे पेंग बढ़ाएं
सूरज चंदा बाँध पोटली, साध उजाले गायें 





चित्र गूगल से साभार