रविवार, 2 सितंबर 2012

मेरी नैया


छपाछप छैया ताल तलैया
नाचूँ मैं और मेरा भैया
बनी तो यह कागज की लेकिन
मुझको प्यारी मेरी नैया    


बिन पानी तो चलती कैसे
डूब डूब उतराती कैसे
बिन मोटर और बिन पतवार
ठुमक ठुमक इतराती ऐसे


दूर देश की सैर करे हम
बाधाओं से नहीं डरें हम
ठानी मन में नया करें कुछ
बन कोलम्बस बढे कदम 

बुधवार, 18 जुलाई 2012

चाट



कितने दिनों तक देखी बाट
माँ से आज बनवाई चाट
आलू मटर छोले नमकीन
अब तो अपने हो गए ठाट

पत्ते पर था उसे सजाया
चाट मसाला भी बुरकाया
चटनी भी थी खट्टी मीठी
चाट चाट के सबने खाया

खुशबू थी कुछ उसकी ऐसी
जान गए थे सभी पड़ोसी
हम तो सारे मिल जुल बैठे
बिल्लू अब्दुल पिंटू जस्सी

मानो जीभ लगे अंगारे
मिर्च लगी तो दीखे तारे
छुट्टी हमने खूब मनाई
खाकर चीनी खुश थे सारे