बुधवार, 18 जुलाई 2012

चाट



कितने दिनों तक देखी बाट
माँ से आज बनवाई चाट
आलू मटर छोले नमकीन
अब तो अपने हो गए ठाट

पत्ते पर था उसे सजाया
चाट मसाला भी बुरकाया
चटनी भी थी खट्टी मीठी
चाट चाट के सबने खाया

खुशबू थी कुछ उसकी ऐसी
जान गए थे सभी पड़ोसी
हम तो सारे मिल जुल बैठे
बिल्लू अब्दुल पिंटू जस्सी

मानो जीभ लगे अंगारे
मिर्च लगी तो दीखे तारे
छुट्टी हमने खूब मनाई
खाकर चीनी खुश थे सारे






  


14 टिप्‍पणियां:

  1. वंदना जी इधर मुंह में पानी आ रहा है...

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    बरसात में चाट बहुत अच्छी लगती है।

    उत्तर देंहटाएं
  3. अरे वाह इस कविता को पढ़कर तो मेरे मुंह में भी पानी आगया अब तो मुझे भी चाट खानी ही पड़ेगी :-)

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत बढ़िया लगी ये चाट की कविता.....

    उत्तर देंहटाएं
  5. ओहो ... आज तो मुंह में पानी आ गया ... शाम को जाना पड़ेगा खाने ... सुन्दर रचना ...

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुत सुन्दर रचना...चाट देख कर मुंह में पानी आ गया...

    उत्तर देंहटाएं
  7. देख देख के मन ललचाता,
    मुह के भीतर पानी आता।
    छोड़ अभी मैं भी जाता हूँ,
    चाट मंगा तत्क्षण खाता हूँ।

    उत्तर देंहटाएं
  8. ये तो मुँह में पानी आ गया. आज इस कविता को ही खा जाने का मन कर रहा है.

    उत्तर देंहटाएं
  9. बाल कविताएँ लिखने वाले कम ही हैं । आप अच्छा कर रही हैं जो बाल कविताएँ लिख रही हैं । अच्छी रचना है। मेरी बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  10. बहुत सुन्दर रचना , सार्थक भाव , बधाई.

    कृपया मेरे ब्लॉग पर भी पधारें , आभारी होऊंगा .

    उत्तर देंहटाएं
  11. अरे वाह!
    क्या खूब ठाठ हैं आपकी चाट के.
    दिन में तारे दिखाती चटपटी.

    आपकी सरल शब्दों में लिखी कविता
    दिल को लुभाती है ,वन्दना जी.

    समय मिलने पर मेरे ब्लॉग पर आईएगा.

    उत्तर देंहटाएं
  12. मुंह में पानी आ रहा है। खाने को मिलेगी क्‍या इतनी सुंदर चाट।

    ............
    डायन का तिलिस्‍म!
    हर अदा पर निसार हो जाएँ...

    उत्तर देंहटाएं
  13. मन में हिलोरें सी उठ रही हैं ..वापिस अपने पुराने दिनों में पहुंचा दिया 'तितली ' ने ...खूबसूरत कारनामा है यह आपका .. :)

    उत्तर देंहटाएं