रविवार, 21 अक्तूबर 2012

पेड़ और प्रकाश संश्लेषण



ना सांस लेते दिखाई दें
ना बात करते सुनाई दें
ना चलते न दौड़ ही पाते
मगर सजीव ये कहलाते

ज्ञान गंगा डुबकी लगाओ
भैया मेरे मुझे बताओ
मम्मी मुझको देती खाना
चिड़िया भी है खाती दाना

पेड़ कहाँ से भोजन पायें
बिना हाथों कैसे पकाएं
खाना इन्हें भेजता कौन
बोलो न भैया क्यों हो मौन

पत्तियाँ इनका कारखाना
क्लोरोफिल का भरा खजाना
धूप हवा पानी मिल जाए
फिर ये भोजन स्वयं बनाएँ

कार्बन डाई ऑक्साइड रेट
दे ऑक्सीजन अनोखी भेंट
स्टार्च-शर्करा झट बन जाए
प्रकाश संश्लेषण कहलाये


(चित्र गूगल से साभार )

9 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    --
    दुर्गाष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएँ!

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  2. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टि की चर्चा मंगलवार २३/१०/१२ को राजेश कुमारी द्वारा चर्चा मंच पर की जायेगी आपका स्वागत है

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  3. बहुत बढ़िया कविता ....कितना कुछ समझाती सिखाती

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  4. रोचकता से सब कुछ सिखा दिया...बहुत सुंदर...

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  5. वाह वाह ... रोचक अंदाज़ से बता दिया राज ...

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  6. बहुत मन-भायी आपकी रचना .....

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